
विशेष: बदलते जमाने की रंग बदलती होली: प्रियंका 'सौरभ'
नकली जमाने की रंग नाजुक होली
आज हम जो होली बनाते हैं, वह पहले की होली से अलग है। पहले, यह त्योहार लोगों के बीच अपार खुशी और एकता लेकर आता था। उस वक़्त प्यार का सच्चा एहसास जो था और दोस्त कहीं नज़र नहीं आया। परिवार और दोस्त मिश्रित युगल और हँसी-मज़ाक के साथ जश्न मनाते थे। जैसे-जैसे समय परिवर्तन है, रिश्ते की गर्माहट पक्की नजर आती है। आजकल होली की बधाई अक्सर मोबाइल या इंटरनेट पर भेजे गए "हैप्पी होली" के साथ शुरू और होती है। जैसा कि पहले उत्साह और जश्न का माहौल अब नहीं रहा। पहले बच्चे हर चॉकलेट में होली के लिए ग्रुप बनाकर होली का जश्न मनाते थे और खुशी-खुशी किसी पर भी रंग दिखाते थे। यहाँ तक कि जब उन्हें ख़राब या ख़त्म किया जाता था, तो वे हंसते थे। अब ऐसा लगता है कि लोग मौज-मस्ती करने के बजाय बहस करने में ज्यादा रुचि रखते हैं।
-:प्रियंका 'सौरभ':-
हिसार (हरियाणा): रिसर्च स्कोलर इन राजनीतिक विज्ञान, कवियित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार - श्रीमती प्रियंका 'सौरभ' ने आज विशेष में "बदलते जमाने की रंग बदलती होली" शीर्षक से प्रस्तुत लेख में बताया कि, होली एक ऐसा त्योहार है जिसमें हर पृष्ठभूमि के लोग मिलते हैं, जिसमें प्यारे प्यारे गले मिलते हैं। फिर भी, एकता और प्यार का यह त्यौहार बदल रहा है। फाल्गुन की खुशियाँ अब दूर की यादों की तरह हैं। होली के रंग, कुछ सागरों में फीके पड़े हैं। बड़े-बुजुर्ग में इस बात पर अफसोस जताया गया है कि अब हंसी-मजाक, उत्साह और जीवंत भावना नहीं रही जो कभी इस उत्सव की पहचान बन गई थी। पानी की बहारों की आवाज और होली की जीवंतता ने कुछ ही घंटों के जश्न के बाद एक शांति ले ली है। "आओ राधे खेलें फाग, होली होने वाली है आई" के हर्षोल्लास और उत्सव के अवसर-गिर्द वाली मस्ती-मजाक की आवाजें समय के साथ दबती जा रही हैं।
फाल्गुन आते ही होली का उत्साह हवा में थपकने लगा। पितृलोक में फाग की गूंज गूंजने लगी और होली के लोकगीत हर बार सुनने लगे। शाम को ढप-चंग के साथ पारंपरिक नृत्यों ने होली के रंग बिखेरे। लोग खुशी से एक-दूसरे पर पानी की छीनाझपटी कर रहे थे और कोई भूत-प्रेत नहीं था, बस खुशी थी। होली की तैयारियां वसंत पंचमी से ही शुरू हो गईं, जहां और समुदाय के आंगन और मंदिर की थाप से जीवंत हो उठे थे। रात में चंग की थाप के साथ नृत्य करके सभी को अपनी ओर आकर्षित कर लिया गया। दूर से फाल्गुन गीत और रसिया गाने वाले लोग डांस में शामिल थे अकेले की छांव में होली का आनंद लेते थे। हालाँकि, जैसे-जैसे समय परिवर्तन होता है, राष्ट्र की रामाहाट को अंतिम दर्शन मिलते हैं। आजकल होली की बधाई अक्सर मोबाइल या इंटरनेट पर भेजे गए "हैप्पी होली" के साथ शुरू और होती है। जैसा कि पहले उत्साह और जश्न का माहौल अब नहीं रहा। पहले बच्चे हर चॉकलेट में होली के लिए ग्रुप बनाकर होली का जश्न मनाते थे और खुशी-खुशी किसी पर भी रंग दिखाते थे। यहाँ तक कि जब उन्हें ख़राब या ख़त्म किया जाता था, तो वे हंसते थे। अब ऐसा लगता है कि लोग मौज-मस्ती करने के बजाय बहस करने में ज्यादा रुचि रखते हैं।
पहले के समय में पड़ोसियों की बहू-बेटियों को परिवार की तरह माना जाता था। घर में स्वादिष्ट शैली की खुशबू से भर गए थे और आतंकवादियों का खुले दिल से स्वागत किया गया था। आज, समारोह ज्यादातर अपने घर तक ही सीमित रह गए हैं और समुदाय की भावना कम हो रही है। फ़ोन पर एक साधारण "होली मुबारक" ने पहले दिल से जुड़े रिश्ते की जगह ले ली है, जिससे स्वाद कम मधुर लगते हैं। इस बदलाव के कारण परिवार अपनी बहू-बेटियों के दोस्तों या रिश्तेदारों से मिलने में हिचकिचाता है। पहले लड़कियाँ होली के दौरान खुशियाँ और हँसी-मजाक करती थी खुली हवा में घूमती थी, लेकिन अब अगर कोई लड़की किसी भी तरह से आदिवासियों के घर देर तक रुकती है, तो उसके परिवार में चिंता पैदा हो जाती है।
होली का त्योहार खुशियों का मौसम आया था, शुरुआत होली के उपाय से हुई थी। छोटी-छोटी लड़कियाँ गाय के गोबर से वलुडिया होती थीं, खूबसूरत खूबसूरत लड़कियाँ होती थीं, जिन पर आभूषण, नारियल, पाइप और बिछिया होती थीं। दुख की बात है कि ये परंपराएं अब खत्म हो चुकी हैं। पहले घर पर ही टेसू और पलाश के फूलों को पीसकर रंग दिया जाता था और महिलाएं होली के गीत गाती थीं। होली के दिन सभी लोग चंग की ताल पर नाचते हुए जश्न मनाते थे। बसंत पंचमी से ही फाग की धुनें गूंजने लगती थीं, लेकिन अब होली के गीत कुछ ही जगह बताए जाते हैं। परंपरागत रूप से, विभिन्न समूहों के लोग ढोलक और चांग की थाप के साथ होली खेलने के लिए सामूहिक रूप से होते थे। अब वह जीवंत भावना कहाँ चली गई है?
आज, होली महज़ एक परंपरा की तरह दिखती है। हाल के वर्षों में, सामाजिक आक्रोश और विभाजन बहुत बढ़ गया है कि कई परिवार इस त्योहार के दिन घर के अंदर ही रहना पसंद करते हैं। वैसे तो लोग पुराने से होली के त्योहार पर उत्साह के साथ आ रहे हैं, लेकिन इस त्योहार का असली उद्देश्य भाईचारा और नकारात्मकता को दूर करना है, जो अब कहीं खो गया है। समाज के कई आदर्शों का सामना किया जा रहा है और सामाजिक अप्रिय प्रेम, भाईचारे और समाज के सिद्धांतों को खत्म किया जा रहा है। एक समय था जब होली एक महत्वपूर्ण अवसर था, जब परिवार होलिका दहन देखने के लिए एकत्रित होते थे और उसी दिन वे खुशी-खुशी एक-दूसरे पर रंग-बिरंगे और अबीर फेंकते थे। सामूहिक होली की खुशियाँ बांटने के लिए एक-दूसरे के घर जाते थे और भांग की भावना में डूबे हुए फगुआ गीत गाते थे। अब हकीकत तो यह है कि होली पर कुछ ही लोग घर से बाहर रहना पसंद करते हैं। हर महीने और हर मौसम में एक नया त्यौहार आता है, जो हमें उस खुशी की याद दिलाता है जो वे ला सकते हैं। ये उत्सव हमसे आशा करते हैं, हमारे साथियों में जागते हैं और अकेले की भावनाओं को दूर करते हैं, भले ही कुछ पल के लिए ही क्यों न हो। हमें इस त्योहारी भावना को संजोकर रखना चाहिए।
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