नरमी चक्रीय, सुधार की जरूरत: भारतीय रिजर्व बैंक
मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा गुरुवार को जारी सालाना रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में नरमी चक्रीय हो सकती है और इसमें तत्काल सुधार की जरूरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2019-20 की शुरुआत से ही वृहद आर्थिक माहौल अनिश्चित बना हुआ है और वित्तीय बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। केंद्रीय बैंक ने कहा, "भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर इस समय अहम सवाल यह है कि यह अस्थायी नरमी है या चक्रीय गिरावट अथवा इस सुस्ती के पीछे संरचनात्मक मुद्दे बड़ी वजह हैं? यह नीतिगत प्रक्रिया को निर्धारित करेगा।"
सालाना रिपोर्ट में कहा गया है, "हालिया गिरावट गहरी संरचनात्मक सुस्ती के बजाय अस्थायी नरमी हो सकती है जो चक्रीय गिरावट में बदल सकती है। हालांकि जमीनए श्रम और कृषि उपज विपणन जैसे क्षेत्रों से जुड़ी गतिविधियों में संचारात्मक समस्या है, जिसे दूर करने की जरूरत है।" रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समस्या का पता लगाना कठिन है और इसे पूरी तरह दूर करना भी मुश्किल है, और विनिर्माण, व्यापार, होटलों, परिवहन, संचार एवं प्रसारण, निर्माण, कृषि और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में चक्रीय गिरावट बनी हुई है। इस नरमी से उबारने के लिए इन क्षेत्रों की समस्याओं और चुनौतियों को दूर करने की जरूरत है।
केंद्रीय बैंक ने कहा है, "2019-20 में खपत मांग और निजी निवेश में सुधार सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। बैंकिंग और गैर-बैंकिंग क्षेत्रों को मजबूती प्रदान करना, बुनियादी ढांचे पर व्यय बढ़ाने पर जोर देना होगा। इसके साथ ही श्रम सुधार, कराधान तथा अन्य कानूनी सुधारों में संरचनात्मक सुधार की जरूरत है। 2024-25 तक भारत को 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए कारोबारी सुगमता को भी बढ़ावा देना होगा।" फिलहाल भारत में निवेश में सुधार की गति धीमी हैए वहीं देश में मांग को बढ़ाने वाला उपभोग भी आम तौर पर निवेश में तेजी आने पर निर्भर करता है।
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और सकल पूंजी निर्माण का अनुपात, जिससे निवेश दर आंकी जाती है, 2017-18 में घटकर 32.3 फीसदी रह गया। हालांकि 2017-18 की दूसरी छमाही में इसमें थोड़ा सुधार हुआ था लेकिन बाद में इसकी गति मंद पड़ गई। सर्वेक्षणों के मुताबिक रुझान स्तर से अधिक क्षमता उपयोग से नए निवेश में तेजी आनी चाहिए लेकिन पूंजीगत खर्च का चक्र सपाट बना हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां मांग पूरी करने के लिए क्षमता का विस्तार करने के बजाय मौजूदा क्षमता का ही अधिक से अधिक इस्तेमाल कर रही हैं। बिक्री की रफ्तार घटने से धारणा भी प्रभावित हो रही है।
वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है, "निवेश क्यों नहीं आ रहा है? इसकी मुख्य वजह घरेलू मांग है। नीतिगत जोर किस बात पर होना चाहिए? कारोबार को आसान बनाने, उत्पादन से संबंधित कारकों जैसे भूमि और श्रम सुधार, विभिन्न देशों के बीच व्यापारिक तनाव के कारण उभरी संभावनाओं का फायदा उठाने और सरकार द्वारा पूंजीगत खर्च के क्रियान्वयन में तेजी लाने और इसी तरह के अन्य उपायों पर जोर होना चाहिए। इससे अर्थव्यवस्था में तेजी लाई जा सकती है।" कृषि क्षेत्र में तुरंत सुधार किए जाने की जरूरत है। किसानों की आय दोगुना करने के लिए ज्यादा कोल्ड स्टोरेज की जरूरत है और बाजार व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए। हालांकि वित्तीय क्षेत्र में पुनर्पूंजीकरण के कारण बैंक पटरी पर लौट रहे हैं जबकि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता {आईबीसी) क्रांतिकारी साबित हो रही है। मार्च 2019 में बैंकिंग प्रणाली में सकल गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (जीएनपीए) अनुपात घटकर 9.1 फीसदी रह गया जो पिछले साल 11.2 फीसदी था। व्यवस्था स्तरीय प्रावधान कवरेज अनुपात बढ़कर 60.9 फीसदी हो गया है जो हाल तक करीब 50 फीसदी था। पुनर्पूंजीकरण के कारण बैंकों का पूंजी बफर 2.7 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई है जिसमें 2019-20 का बजटीय आवंटन भी शामिल है। रिपोर्ट में कहा गया है कि संकट कम होने से बैंकों में क्रेडिट प्रवाह की स्थिति काफी हद तक सुधरी है।
आरबीआई ने कहा कि इसका मकसद भविष्य में एनपीए संकट को बनने से रोकना और बैंकिंग क्षेत्र को बचाना है। लेकिन गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में अति उत्साह और ज्यादा निवेश के कारण संपत्ति और देनदारी में भारी अंतर है। हालांकि कुल बैंकिंग और गैर बैंकिंग परिसंपत्तियों में एनबीएफसी की महज 12 फीसदी हिस्सेदारी है लेकिन चूक और नकदी की कमी के कारण पैदा हुए संकट ने वित्तीय व्यवस्था की खामियों को उजागर कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने कहा कि एनबीएफसी में नकदी और नियामकीय ढांचे को मजबूत करने के लिए किए जा रहे प्रयासों से मदद मिलेगी। वर्ष 2018-19 में इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के जरिये खुदरा लेनदेन में 59 फीसदी बढ़ोतरी हुई और यह 23.3 अरब रुपय पहुंच गया।
(साभार- बिजनस स्टैण्डर्ड)
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