विशेष प्रस्तुति: क्रान्तिकारी- भगत सिंह के 111वीं जन्म दिवस पर उनका
'जिंदगी तो सिर्फ अपने कंधों पर जी जाती है, दूसरों के कंधे पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं': भगत सिंह
फोटो: भगत सिंह 1929 ई० में
शहीद भगत सिंह की आज 111वीं जयंती है। अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए वह महज तेइस वर्ष की उम्र में ही फांसी के फंदे पर झूल गए थे।
फोटो: सुखदेव, राजगुरु तथा भगत सिंह के लटकाये जाने की ख़बर - लाहौर से प्रकाशित द ट्रिब्युन के मुख्य पृष्ठ
लखनऊ: 28 सितंबर 1907 को जिला लायलपुर (अब पाकिस्तान में) के गांव बावली में जन्मे शहीदे आजम भगत सिंह की आज 111वीं जयंती है।
अपने क्रांतिकारी विचारों और कदमों से अंग्रेजी हकूमत की जड़े हिला देने वाले भगत सिंह कहते थे, 'बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आती, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।'
जैसे ही 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन खत्म करने की घोषणा की तो भगत सिंह का अहिंसावादी विचारधारा से मोहभंग हो गया था।
फिल्में देखने के शौकीन भगत सिंह नाट्य अभिनय भी करते थे।
अंग्रेज अधिकारी जॉन सॉन्डर्स को गोली मारने से पहले उन्होंने अमेरिकी लेखक हैरिएट बीचर के गुलामी के खिलाफ बनाई गई 'अंकल टॉम्स केबिन' फिल्म देखी थी।
भगत सिंह कहते थे, 'प्रेमी पागल और कवि एक ही चीज से बने होते हैं और देशभक्तों को अक्सर लोग पागल कहते हैं।'
जन्म और परिवेश
भगत सिंह संधु का जन्म 28 सितंबर 1907 को प्रचलित है परन्तु तत्कालीन अनेक साक्ष्यों के अनुसार उनका जन्म 19 अक्टूबर 1907 ई० को हुआ था।
उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक जाट सिक्ख परिवार था।
अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था।
लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी।
काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।
इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था।
भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था।
इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी।
क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे।
बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।
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