मॉनसून सत्र: कामकाज का सूखा
- कैसा रहेगा मॉनसून सत्र...
16वीं लोकसभा के अंतिम सत्र से पहले वाला यह सत्र 18 जुलाई से 10 अगस्त तक चलने वाला है। लेकिन इस सत्र में भी सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी दलों में सहमति बनने के आसार नहीं
► 18 जुलाई-10 अगस्त, 18 बैठकें
► हो सकता है 16वीं लोकसभा के अंतिम से पहले वाला सत्र
► राज्य सभा के नए उपसभापति का चुनाव
कई प्रमुख विधेयक और अध्यादेशों को पेश किया जाना/ मंजूरी और बहस
► ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (संशोधन) अध्यादेश
► भगोड़ा आर्थिक अपराधी अध्यादेश
► आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश (अल्पवयस्कों के साथ बलात्कार संबंधी कानून में संशोधन)
► उच्च न्यायालयों की वाणिज्यिक अदालतों, वाणिज्यिक पीठ और वाणिज्यिक अपीलीय पीठ संबंधी अध्यादेश (उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में वाणिज्यिक अदालतों का गठन)
► अन्य अध्यादेशों में राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय अध्यादेश एवं होमियोपैथी केंद्रीय परिषद (संशोधन) अध्यादेश।
जो विधेयक पेश हो सकते हैं
► तीन तलाक विधेयक (लोकसभा से पारित, राज्यसभा में लंबित)
► राष्ट्रीय ओबीसी आयोग के संवैधानिक दर्जे से संबंधित विधेयक (लोकसभा से पारित, राज्यसभा में लंबित)
► भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक (लोकसभा में 12 मार्च को पेश)
► अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (संशोधन) अध्योदश (पेश होना है)
► आपराधिक विधि संशोधन विधेयक (पेश होना है)
► राष्ट्रीय चिकित्सा शिक्षा आयोग विधेयक (लोकसभा में लंबित)
► ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण विधेयक (लोकसभा में लंबित)
नयी दिल्ली, 16 जुलाई: संसद का मॉनसून सत्र बुधवार को शुरू हो रहा है। इस सत्र में पहली बार राज्यसभा के सदस्य संविधान में अधिसूचित 22 भाषाओं में बोलने में सक्षम होंगे। दरअसल अब इन सभी भाषाओं की समांतर व्याख्या की व्यवस्था कर दी गई है। परंतु लगता नहीं कि इस सत्र में भी हमारे सांसद किसी की कोई बात सुनने को तैयार होंगे। अगर सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी दलों के बीच कोई सहमति नहीं बनती है तो 16वीं लोकसभा का अंतिम से पहले वाला यह सत्र भी कामकाज को तरसता रहेगा। अनुमान यही है कि 18 जुलाई से 10 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में भी बार-बार बाधा उत्पन्न होगी।
संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार ने हाल ही में संकेत दिया था कि इस सत्र में मोदी सरकार का विधायी एजेंडा आर्थिक और राजनीतिक एजेंडों का मिश्रण होगा। कुछ प्रमुख अध्यादेशों को दोनों सदनों की मंजूरी चाहिए और इन अध्यादेशों की जगह आने वाले विधेयकों पर चर्चा कर उन्हें पारित करना होगा। इन अध्यादेशों में ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (संशोधन) अध्यादेश, भगोड़े आर्थिक अपराधी अध्यादेश और उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों का वाणिज्यिक पीठ बनाने संबंधी अध्यादेश शामिल हैं।
आपराधिक विधि (संशोधन) अध्यादेश जो 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को मृत्युदंड समेत कठोर दंड का प्रावधान करता है, उसे भी मंजूरी देनी होगी। इसे लेकर एक विधेयक लाना होगा। भगोड़े आर्थिक अपराधी विधेयक लोकसभा के पास लंबित है। इसे 12 मार्च को सदन में पेश किया गया था। सरकार को राज्य सभा में विपक्ष की गतिविधियों का लाभ लेने की कोशिश करनी चाहिए। उच्च सदन में भाजपानीत राजग अभी भी सामान्य बहुमत नहीं पा सका है। इस मौके का फायदा वह पिछड़ा वर्ग के एक आयोग को सांविधिक दर्जा देने के लिए समर्थन जुटाने में ले सकता है। विपक्ष तीन तलाक के विवादास्पद विधेयक पर भी समर्थन देने से इनकार करता रहा है। लोकसभा में ये दोनों विधेयक पास हो चुके हैं।
मार्च में बजट सत्र के दूसरे हिस्से में विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ प्रतीकात्मक अविश्वास मत लाकर जो पटकथा लिखी थी वह मॉनसून सत्र में भी दोहराई जाती नजर आएगी। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उस अविश्वास मत को मंजूरी नहीं दी थी। तेलुगू देशम पार्टी ने कहा है कि वह आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने में विफल रहने के लिए मॉनसून सत्र में फिर सरकार के खिलाफ अविश्वास मत लाएगी। तेलुगू देशम की विरोधी, वाईएसआर कांगे्रस पार्टी भी उसका साथ दे सकती है।
तेलुगू देशम के वरिष्ठï नेता लंका दिनाकरन ने शुक्रवार को कहा कि पार्टी ने अन्य विपक्षी दलों से समर्थन मांगा है। बजट सत्र में अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) के सदस्यों ने कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग के साथ कार्यवाही बाधित की थी। माना जा रहा है कि वे नए सत्र में भी मुद्दा उठाएंगे। माकपा के लोकसभा सदस्य मोहम्मद सलीम ने आरोप लगाया है कि अन्नाद्रमुक मोदी सरकार के कहने पर यह बाधा पैदा करती है। बजट सत्र में विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया था कि वह अर्थव्यवस्था समेत अहम मुद्दों पर चर्चा से बच रही है। उस समय वित्त विधेयक पर भी कोई चर्चा नहीं हुई जबकि वह लोकसभा में तमाम बाधाओं के बीच पारित हुआ था। संसद के बाहर किसान समूह और मजदूर संगठन सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन का मन बनाए हुए हैं। नौ अगस्त को सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ है। उस दिन कई मजदूर संगठन और किसान संगठन दिल्ली में प्रदर्शन करके कृषि संकट और सरकार की श्रम विरोधी नीतियों का विरोध करेंगे।
राज्य सभा के उपसभापति का चुनाव भी होना है। मोदी सरकार को इस सत्र में अपने संकट मोचक और उच्च सदन में उसके नेता अरुण जेटली का साथ भी नहीं मिल पाएगा। जेटली की अनुपस्थिति में राज्य सभा में यह जिम्मेदारी अमित शाह पर आएगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि शाह उपसभापति पद के लिए राजग उम्मीदवार के नाम पर क्षेत्रीय दलों का समर्थन कैसे जुटाते हैं। फिलहाल आंकड़े न तो सरकार के पक्ष में हैं और न ही विपक्ष के पास। विपक्ष की ओर से तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुखेंदु शेखर रॉय उम्मीदवार हो सकते हैं जबकि अटकल है कि राजग शिरोमणि अकाली दल के नरेश गुजराल को उम्मीदवार बना सकता है। बीजू जनता दल के पास नौ राज्य सभा सदस्य हैं और उसका समर्थन निर्णायक हो सकता है।
आशा यही है कि विपक्षी दल अर्थव्यवस्था, दलितों और अल्पसंख्यकों को भीड़ द्वारा मारे जाने, सोशल मीडिया पर होने वाली ट्रोलिंग आदि पर चर्चा चाहें। इस ट्रोलिंग ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और सरकार की विदेश नीति तक को चपेट में ले लिया। परंतु राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के विधानसभा चुनाव बमुश्किल तीन महीना दूर हैं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव भी करीब हैं। ऐसे में लगता नहीं कि सरकार या विपक्ष एक दूसरे को जरा भी मौका देंगे।
(साभार- बी.एस.)
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