3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (शांति के भविष्य का निर्माण): स्वतंत्र प्रेस की निर्णायक भूमिका
पिथौरागढ़, उत्तराखंड: आज 3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर 'विशेष' में प्रस्तुत है, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार व लेखक सुनील कुमार महला की विशेष प्रस्तुति जिसका शीर्षक है - "शांति के भविष्य का निर्माण: स्वतंत्र प्रेस की निर्णायक भूमिका"।
"शांति के भविष्य का निर्माण: स्वतंत्र प्रेस की निर्णायक भूमिका":
(3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष आलेख)
मीडिया की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मजबूती के संदर्भ में हर वर्ष 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि मीडिया केवल समाचार देने का ही माध्यम नहीं है, बल्कि यह विश्व में शांति, पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करने का भी एक सशक्त व शानदार उपकरण है।
कहना ग़लत नहीं होगा कि किसी भी देश में प्रेस की स्थिति उसके लोकतंत्र की मजबूती का असली दर्पण होती है, शायद यही कारण भी है कि इसे ‘लोकतंत्र का आईना’ भी कहा जाता है। वास्तव में, प्रेस की स्वतंत्रता सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी है, जो एक मौलिक मानव अधिकार है।
सच तो यह है कि यह केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार भी है।पाठक जानते होंगे कि कई देशों में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
यहां पाठकों को बताता चलूं कि इस दिवस का मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को समझाना, पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
यदि हम इस दिवस के इतिहास पर दृष्टि डालें तो वर्ष 1991 में नामीबिया(अफ्रीका) में आयोजित सम्मेलन में ‘विंडहोक घोषणा’ को अपनाया गया था, जिसमें स्वतंत्र, बहुलवादी और मुक्त प्रेस का आह्वान किया गया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1993 में 3 मई को इस दिवस के रूप में घोषित किया।
गौरतलब है कि यह प्रस्ताव यूनेस्को के 26वें महासम्मेलन में पारित किया गया था।यहां उल्लेखनीय है कि इस दिवस पर हर वर्ष एक वैश्विक सम्मेलन आयोजित किया जाता है। वर्ष 2026 में यह सम्मेलन लुसाका (जाम्बिया) में आयोजित हो रहा है, जहां पत्रकार, तकनीकी विशेषज्ञ, नीति-निर्माता और मानवाधिकार कार्यकर्ता एक साथ विचार-विमर्श करते हैं। इतना ही नहीं, इसी अवसर पर यूनेस्को द्वारा ‘गिलर्मो कैनो विश्व प्रेस स्वतंत्रता पुरस्कार’ भी प्रदान किया जाता है, जो उन पत्रकारों को सम्मानित करता है, जिन्होंने जोखिम उठाकर सत्य को निष्पक्षता और निडरता से दुनिया के सामने उजागर किया।बहुत कम लोग जानते हैं कि रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स हर वर्ष ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ जारी करता है, जिससे यह आकलन किया जाता है कि किस देश में मीडिया कितनी स्वतंत्र है। वास्तव में, यह सूचकांक वैश्विक स्तर पर प्रेस की स्थिति को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
आज एआइ व संचार क्रांति का दौर है और आज के डिजिटल युग में प्रेस की परिभाषा और स्वरूप दोनों बदल गए हैं। पहले जहां अखबार, रेडियो और टीवी प्रमुख थे, वहीं अब इंटरनेट और सोशल मीडिया भी ‘डिजिटल प्रेस’ का रूप ले चुके हैं।
आम नागरिक भी अब सूचना के प्रसार में भागीदारी कर रहे हैं। इससे सूचना का प्रवाह तेज हुआ है, लेकिन ‘फेक न्यूज़’ और दुष्प्रचार का खतरा भी बढ़ गया है।कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) ने पत्रकारिता के क्षेत्र में नए अवसर और चुनौतियां दोनों पैदा की हैं। यह खबरों के संग्रह और विश्लेषण को तेज बनाती है, लेकिन इसका दुरुपयोग गलत सूचनाएं फैलाने में भी हो सकता है।
सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म यह तय करते हैं कि लोगों को कौन-सी खबर दिखाई जाएगी, जिससे ‘अदृश्य नियंत्रण’ का एक नया स्वरूप उभर रहा है। हर वर्ष इस दिवस की एक थीम निर्धारित की जाती है, जो समकालीन चुनौतियों को दर्शाती है।
वर्ष 2025 की थीम थी-'बहादुर नई दुनिया में रिपोर्टिंग: प्रेस स्वतंत्रता और मीडिया पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव।' वास्तव में, यह थीम खास तौर पर इस बात पर केंद्रित थी कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) पत्रकारिता, मीडिया और सूचना प्रणाली को कैसे बदल रही है।
एआइ(आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)पत्रकारिता को तेज और प्रभावी बना रही है,लेकिन साथ ही फेक न्यूज़, डीपफेक और दुष्प्रचार जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ा रही है।
इस थीम का मुख्य संदेश था कि तकनीक का उपयोग इस तरह किया जाए कि वह प्रेस की स्वतंत्रता को मजबूत करे, कमजोर नहीं।वहीं वर्ष 2026 की थीम है-'शांति के भविष्य का निर्माण: मानवाधिकार, विकास और सुरक्षा के लिए प्रेस स्वतंत्रता को बढ़ावा देना।'
भारत के संदर्भ में, संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन यह अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में निहित है। यह नागरिकों को बिना किसी भय के अपनी बात रखने का अधिकार देता है।
हालांकि; राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर कुछ सीमाएं भी लागू होती हैं।
गौरतलब है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भारतीय प्रेस परिषद, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया जैसे संस्थान कार्यरत हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स और कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के समय में प्रेस और पत्रकारिता के समक्ष कई चुनौतियां मौजूद हैं। मसलन-पत्रकारों पर हमले, धमकियां, मानहानि के मुकदमे, मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण, सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता, राजद्रोह और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कानून, तथा ‘सेल्फ-सेंसरशिप’। ये सभी प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं।
बहरहाल, यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत में हर वर्ष 16 नवंबर को ‘राष्ट्रीय प्रेस दिवस’ मनाया जाता है, जो प्रेस की जिम्मेदारी और स्वतंत्रता की याद दिलाता है। प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और ‘वॉचडॉग’ की भूमिका निभाता है। यह सरकार और अन्य शक्तिशाली संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करता है, भ्रष्टाचार को उजागर करता है और नागरिकों को जागरूक बनाता है।
प्रसिद्ध पत्रकार वाल्टर क्रोनकाइट ने कहा था-'प्रेस की स्वतंत्रता केवल लोकतंत्र के लिए आवश्यक नहीं है, बल्कि यह स्वयं लोकतंत्र है।' वहीं अल्बर्ट कैमस के अनुसार-'स्वतंत्र प्रेस अच्छा या बुरा हो सकता है, लेकिन स्वतंत्रता के बिना वह कभी अच्छा नहीं हो सकता।' और फिनले पीटर डन ने पत्रकारिता का सार बताते हुए कहा था कि-'पत्रकारिता का कर्तव्य पीड़ितों को सांत्वना देना और शक्तिशाली लोगों को असहज करना है।'
अंततः, प्रेस की स्वतंत्रता केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र, पारदर्शिता और विकास का आधार है। इसकी रक्षा करना सरकार, मीडिया और नागरिक-तीनों की साझा जिम्मेदारी है।
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