आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हर चीज का विकल्प हो सकता है, लेकिन यह सत्यनिष्ठा का स्थान नहीं ले सकता: डॉ. जितेंद्र सिंह
भारत की एआई प्रगति को मिली वैश्विक पहचान, डॉ. जितेंद्र सिंह ने एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में समावेशी और नैतिक तकनीक अपनाने का आह्वान किया
डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के "MANAV" (मानव) मंत्र का आह्वान करते हुए एआई के मानव-केंद्रित उपयोग पर जोर दिया
CPGRAMS से टेलीमेडिसिन तक: हाइब्रिड एआई मॉडल बेहतर परिणाम दे रहा है, क्षमता विकास आयोग (सीबीसी) भारत के तकनीक-संचालित गवर्नेंस सुधारों का नेतृत्व कर रहा है
एक दशक में लगभग 2,000 पुराने नियम खत्म हुए, भारत ने तकनीक-आधारित गवर्नेंस को अपनाया, भविष्य के एआई-संचालित देश के लिए क्षमता विकास ही मूल कुंजी: डॉ. जितेंद्र सिंह
नई-दिल्ली (PIB): "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इस ग्रह पर हर चीज का विकल्प बन सकता है, लेकिन यह सत्यनिष्ठा का स्थान नहीं ले सकता। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम को बदल सकता है, दक्षता बढ़ा सकता है और पहुंच का विस्तार कर सकता है, लेकिन यह मानवीय ईमानदारी की जगह नहीं ले सकता।"
इस सशक्त विचार के साथ, केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; पृथ्वी विज्ञान; और पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री, डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज यहाँ भारत मंडपम में "एआई इम्पैक्ट समिट 2026 इंडिया" में अपना मुख्य भाषण दिया। विकसित भारत के लिए एआई: क्षमता विकास की अनिवार्यता" विषय पर आधारित इस सत्र में नीति निर्माताओं, एडमिनिस्ट्रेटर और विशेषज्ञों ने गवर्नेंस, क्षमता विकास और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समन्वय पर विस्तृत विचार-विमर्श किया।
उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कल प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने संबोधन में दिए गए 'MANAV' (मानव) मंत्र का उल्लेख किया। उन्होंने एआई के उपयोग में 'मानव-केंद्रित दृष्टिकोण' पर बल देते हुए गवर्नेंस और क्षमता विकास को एक लगातार और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि आज की तेजी से बदलती दुनिया में संस्थानों को भविष्य के लिए तैयार रहने के लिए खुद को लगातार अपडेट करना होगा।
डॉ. सिंह ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब हर क्षेत्र में एक अपरिहार्य वास्तविकता बन चुकी है और इसे सार्वजनिक प्रणालियों में सार्थक रूप से एकीकृत किया जाना चाहिए।
डॉ. सिंह ने कहा कि भारत की परिवर्तनकारी यात्रा का सबसे उत्साहजनक पहलू एक ऐसा राजनीतिक नेतृत्व है, जो फ्यूचर-रेडी आइडियाज को अपनाने के लिए तत्पर है। उन्होंने याद दिलाया कि डेढ़ दशक पहले आधिकारिक चर्चाओं में एआई-ड्रिवन गवर्नेंस जैसे विषयों की कल्पना करना भी कठिन था। उन्होंने इनोवेशन और गवर्नेंस रिफॉर्म्स के बीच तालमेल बिठाने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की रिफॉर्म-ओरिएंटेड अप्रोच को दिया।
पिछले एक दशक के प्रयासों पर चर्चा करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि लगभग 2,000 पुराने और अप्रासंगिक नियमों को समाप्त कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि इनमें से कई नियम पुराने समय के लिए बनाए गए थे जो आज की तकनीकी प्रगति के अनुकूल नहीं थे। अनावश्यक अटेस्टेशन और पुरानी प्रथाओं को खत्म करना विश्वास-आधारित गवर्नेंस की दिशा में एक बड़ा बदलाव है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि क्षमता विकास आयोग (सीबीसी) की परिकल्पना इसलिए की गई थी ताकि सीखना एक निरंतर संस्थागत आदत बन सके। उन्होंने कहा कि लोक सेवकों को न केवल नई पद्धतियाँ सीखनी चाहिए, बल्कि सीखने की अपनी क्षमता को भी निरंतर बढ़ाना चाहिए। सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की सर्वोत्तम प्रथाओं के मेल ने शासन सुधारों को मजबूती दी है और प्रणालियों को अधिक तेज बनाया है।
डिजिटल पब्लिक गुड्स (डीपीजी) की अवधारणा का संदर्भ देते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भले ही यह शब्दावली नई हो सकती है, लेकिन इसका मूल तत्व लोक कल्याण और नागरिक-केंद्रित गवर्नेंस के सिद्धांतों में निहित है। उन्होंने कहा कि सरकार ने शुरुआत से ही "मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट" (अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार) के विजन का अनुसरण किया है, जिसका मुख्य केंद्र पारदर्शिता, जवाबदेही और ईज ऑफ लिविंग रहा है। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि "तकनीक एक माध्यम (इनेबलर) है, साध्य (एंड) नहीं। इसका अर्थ है कि तकनीक का अंतिम उद्देश्य मानवीय जीवन को सरल बनाना और समाज का कल्याण करना है।
अपने व्यावहारिक अनुभवों को साझा करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने CPGRAMS (लोक शिकायत निवारण प्रणाली) के विकास पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि हालांकि डिजिटल प्रोसेसिंग के माध्यम से शिकायतों के निपटान की दर प्रभावशाली स्तर तक पहुँच गई थी, लेकिन नागरिक संतुष्टि हमेशा उन आंकड़ों के अनुरूप नहीं थी। इसी अनुभव के आधार पर, एआई-संचालित सिस्टम के साथ-साथ ह्यूमन इंटरफेस (मानवीय संवाद) की शुरुआत की गई। इस अनुभव ने यह सिद्ध कर दिया कि सबसे प्रभावी मॉडल एक हाइब्रिड मॉडल है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और ह्यूमन इंटेलिजेंस (एचआई) का कुशलतापूर्वक समन्वय करता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्वास्थ्य क्षेत्र का एक और उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे एआई-सहायता प्राप्त टेलीमेडिसिन सेवाएँ डॉक्टरों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि जहाँ एक ओर एआई कार्यक्षमता और सेवाओं की पहुंच को बढ़ाता है, वहीं एक डॉक्टर की उपस्थिति मरीजों को आश्वस्त करती है और उनमें भरोसा पैदा करती है। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि ऐसे हाइब्रिड मॉडल भारत के विविध सामाजिक और भाषाई परिदृश्य के लिए विशेष रूप से उपयुक्त हैं, जहाँ तकनीक को स्थानीय वास्तविकताओं और संवेदनाओं के अनुरूप ढलना आवश्यक है।
एआई के क्षेत्र में भारत को मिल रही बढ़ती वैश्विक पहचान और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से मिली प्रशंसा का उल्लेख करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हालांकि वैश्विक मानक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समाधान भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि डिजिटल क्षमता-निर्माण पहल की सफलता के लिए समावेशी विस्तार और तकनीक को व्यापक रूप से अपनाना अनिवार्य है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रतिपादित गवर्नेंस के “MODEL” (मॉडल) फ्रेमवर्क की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने इसके पाँच प्रमुख स्तंभों—नैतिक और सदाचारी प्रणालियाँ (मोरल और एथिकल सिस्टम), जवाबदेह शासन (अकाउंटेबल गवर्नेंस), राष्ट्रीय शोधनक्षमता (नेशनल सॉल्वेंसी), सुलभ और समावेशी प्रणालियाँ (एक्सेसिबल और इनक्लूसिव सिस्टम) तथा वैधता और प्रमाणिकता (लेजिटिमेसी और वैलिडिटी)—पर प्रकाश डाला। डॉ. सिंह ने इस बात पर विशेष बल दिया कि वास्तविक क्षमता विकास केवल इन संक्षिप्त शब्दों को रटने में नहीं, बल्कि उनके गहरे अर्थ को आत्मसात करने और उन्हें धरातल पर क्रियान्वित करने में निहित है। उन्होंने कहा कि जब शासन के ये सिद्धांत व्यक्तिगत कार्यशैली का हिस्सा बनते हैं, तभी सही मायने में प्रशासनिक सुधार सफल होते हैं।
अपने संबोधन के समापन में, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि तकनीकी प्रगति की असली परीक्षा इसके नैतिक उपयोग में निहित है। उन्होंने टिप्पणी की कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणालियों को बदल सकता है, दक्षता में सुधार कर सकता है और सेवाओं की पहुंच का विस्तार कर सकता है, लेकिन यह कभी भी मानवीय सत्यनिष्ठा का स्थान नहीं ले सकता। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करने की अंतिम जिम्मेदारी व्यक्तियों और संस्थानों की ही है।
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