लहू बोलता भी है: जंगे आजादी ए हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार- "मुजाहिदे-मिल्लत मौलाना हिफज़ुर्रहमान सिवहारवी को"
आइए, जाानते हैं जंंगे आज़ादी ए हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार - "मुजाहिदे-मिल्लत मौलाना हिफज़ुर्रहमान सिवहारवी को"______
10 जनवरी सन् 1901 को सिवहारा (बिजनौर) के बाहैसियत सिद्दीक़ी खानदान में पैदा हुए मौलाना हिफजुर्रहमान का घरेलू नाम मुनीरुद्दीन था मगर आप अपने तवारीख़ी नाम हिफ़जु़र्रहमान से मशहूर हुए।
शुरुआती तालीम घर से लेकर मदरसा फैज़े-आम (स्योहारा) से तालीम हासिल करके आप देवबंद पहुंचे, जहां अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी से दीन-दुनियात की आला तालीम हासिलकर आपने कई मदरसों में पढ़ाने का काम किया। लेकिन मौलाना को मिल्लतो-क़ौम को साथ लेकर मुल्क को गुलामी से आज़ाद कराने का ऐसा ज़ज़्बा था कि आपने सियासत मे क़दम रखा और इस राह से मुल्को-मिल्लत और मुल्क़ की आज़ादी के लिए दिलो-जान से लग गये।
मौलाना ने अपनी सियासी ज़िंदगी का आगाज़ खि़लाफ़त मूवमेंट से किया मगर बाद में जमाते-उलमा-ए-हिन्द के प्लेटफार्म से अपनी ज़िंदगी मुल्क व मिल्लत के लिये वक़्फ़ कर दी।
आप सन् 1942 से जब तक ज़िंदा रहे, जमियत के सदर के ओहदे पर कायम रहे। जंगे-आज़ादी के आंदोलनों में आप 6 बार गिरफ्तार हुए और जेल की सज़ाएं काटीं। आपने सन् 1947 के सैलाब के वक़्त या आज़ादी के बाद दिल्ली के फिरक़ावाराना फ़साद के वक़्त जिस जवांमर्दी से क़ौमो-मिल्लत की मदद की, उसके बारे में कुछ भी लिखना आपकी शख़्सियत के मुक़ाबले कम ही होगा। आप बहुत बड़े मुसन्निफ़ भी रहे।
आप की लिखी किताब इस्लाम का एक़तसादी निज़ाम और अख़लाक़ व फलसफ़ये एख़लाक़ बहुत मशहूर हुई।
मौलाना साहब बाद में सांसद भी रहे और आपकी जैसी तक़रीर, (जो संसद में की गयी थी) शायद आजतक किसी मुस्लिम लीडर ने नहीं की होगी। जितनी जुर्रत के साथ आपने संसद में पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल को उंगली दिखाते हुए कहा था कि जवाहर और पटेल तुम जानते हो कि मैंने मुल्क़ की ख़िदमत तुम दोनों से ज़्यादा की है। अगर तुम लोग मुसलमानों से वायदे के मुताबिक़ तहफ़्फ़ुज़ नहीं दे सकते है तो जान लो कि हमें मालूम हैं कि हम अपना तहफ़्फ़ुज़ कैसे करेंगे। लेकिन अगर हम अपने तह़फ़ुज़ के नाम पर उठे तो यह मुल्क बिख़र जायेगा।
मौलाना साहब की तकरीर पर नेहरू और पटेल सिर्फ सहमति में सिर हिलाते रहे, लेकिन अफ़सोस कि उस वक़्त वे जवाब देने की हिम्मत नहीं जुटा सके। मौलाना का इंतक़ाल 2 अगस्त सन् 1962 को हुआ और दिल्ली में आपकी तदफ़ीन अमल में आयी।
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