दिल्ली हाइकोर्ट का बड़ा फैसला: समान काम, समान वेतन के लिए योग्यता भी समान होनी चाहिए
नई-दिल्ली (लाइव लॉ): लाइव लॉ ने, "दिल्ली हाइकोर्ट का बड़ा फैसला: समान काम, समान वेतन के लिए योग्यता भी समान होनी चाहिए" शीर्षक से प्रकाशित समाचार में बताया है कि:
दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'समान काम के लिए समान वेतन' का सिद्धांत केवल पद या काम की समानता पर आधारित नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि दो कैडरों के बीच शैक्षणिक योग्यता में अंतर है तो उनके वेतन में अंतर को जायज ठहराया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दिल्ली मेडिकल टेक्निकल एम्प्लॉइज एसोसिएशन की ओर से दायर किया गया। एसोसिएशन के लैब टेक्नीशियन, जो नगर निगम (MCD) के अस्पतालों में कार्यरत हैं, केंद्र सरकार के संस्थानों (जैसे AIIMS और NICD) के लैब टेक्नीशियनों के समान 5,000-8,000 रुपये के वेतनमान की मांग कर रहे थे। उनका तर्क था कि चूंकि उनके पद का नाम और काम समान है इसलिए उन्हें भी पांचवें वेतन आयोग (5th CPC) की सिफारिशों के अनुसार वेतन मिलना चाहिए।
जस्टिस का निर्णय और कानूनी टिप्पणी
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के पुराने फैसले बरकरार रखते हुए याचिका खारिज की। बेंच ने अवलोकन किया कि वेतन में समानता का दावा केवल इसलिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि पदनाम या काम की प्रकृति समान है।
हाइकोर्ट ने बिहार राज्य बनाम बिहार माध्यमिक शिक्षक संघर्ष समिति' मामले का हवाला देते हुए कहा कि वेतन समानता के लिए भर्ती प्रक्रिया, योग्यता और सेवा शर्तों में पूर्ण समानता होनी अनिवार्य है।
सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि MCD में लैब टेक्नीशियन के लिए न्यूनतम योग्यता केवल मैट्रिक (10वीं) है, जबकि केंद्र सरकार के तहत इसी पद के लिए बी.एससी. (B.Sc.) की डिग्री अनिवार्य है। कोर्ट ने माना कि शैक्षणिक योग्यता वर्गीकरण का एक वैध और तर्कसंगत आधार है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करना एक नीतिगत मामला है। MCD तब तक केंद्र सरकार के वेतनमान को अपनाने के लिए बाध्य नहीं है जब तक कि वह अपनी सेवा नियमावली में आवश्यक बदलाव न कर ले।
याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क भी दिया कि फीडर पोस्ट (सहायक पद) का वेतनमान पदोन्नति वाले पद से अधिक है, जो कि मनमाना है। इस पर हाइकोर्ट ने कहा कि ऐसी विसंगतियां 'ए विसंगति समिति या वेतन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती हैं और अदालत सीधे तौर पर किसी विशिष्ट उच्च वेतनमान का आदेश नहीं दे सकती।
अंत में डिवीजन बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि भर्ती मानदंडों और शैक्षणिक योग्यता में अंतर के कारण याचिकाकर्ताओं का वेतन समानता का दावा कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।
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(समाचार व फोटो साभार: लाइव लॉ)
swatantrabharatnews.com

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