
विशेष: यहाँ प्लास्टिक, वहाँ प्लास्टिक, आख़िर प्लास्टिक कहाँ नहीं है?
लखनऊ: आज विशेष में प्रस्तुत है, उत्तराखंड के फ्रीलांस राइटर, कलामिस्ट और युवा बौद्ध - सुनील कुमार महला द्वारा शीर्षक "यहाँ प्लास्टिक, वहाँ प्लास्टिक, आख़िर प्लास्टिक कहाँ नहीं है?" से विशेष प्रस्तुति।
"यहाँ प्लास्टिक, वहाँ प्लास्टिक, आख़िर प्लास्टिक कहाँ नहीं है?" शीर्षक से प्रस्तुत "विशेष प्रस्तुति" में उत्तराखंड के फ्रीलांस राइटर, कलामिस्ट और युवा बौद्ध - सुनील कुमार महला ने कहा कि,
प्लास्टिक मानव से लेकर धरती के संपूर्ण विश्व, हमारे पर्यावरण और संकेत के लिए एक प्रकार से जहर है।
आज देश-दुनिया में प्लास्टिक ने इतनी सुविधाएं क्यों न दी हो, लेकिन यह मनुष्य, वनस्पति, वनस्पतियों के साथ-साथ पूरी धरती के पर्यावरण को नष्ट कर रहा है।
पाठकों को जानकारी दी गई है कि, हाल ही में भारत के केरल में एक एलपीजी अध्ययन में बोतलबंद पानी में प्लास्टिक माइक्रोबीड्स की खोज हुई है। यह पहली बार नहीं है कि, जब बोतलबंद में पानी मिले प्लास्टिक के महीन कण होना। इससे पहले भी बोतलबंद पानी में प्लास्टिक के उपकरण के कई खुलासे हो चुके हैं। कुछ समय पहले नमक और चीनी तक के मकबरे में प्लास्टिक के महीन संगम के संबंध में एक अध्ययन सामने आया था।
हाल ही में जो अध्ययन सामने आया है, उसमें पता चला है कि 10 प्रमुख प्लास्टिक के बोतलबंद पानी में प्लास्टिक के माइक्रोबीड्स पाए गए हैं। इस अध्ययन से पता चला कि औसत प्रति लीटर तीन से दस लाख माइक्रोबीड्स थे। चारे, टुकड़े, फिल्म और छर्रे सहित विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक पाए गए हैं।
इसलिए कि आज भारत में बोतलबंद पानी का कारोबार लगातार बढ़ रहा है और बच्चे लेकर बोतलबंद महिलाएं सभी बोतलबंद पानी का उपयोग करती नजर आ रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि बोतलबंद पानी के माध्यम से हर साल औसतन 153.3 प्लास्टिक कनस्तर उपयोगकर्ता के शरीर में प्रवेश करते हैं।
स्ट्रेटेजी को बताया गया कि, केरल में बाइक वाले बोतलबंद पानी पर शोध यह अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका स्प्रिंगर नेचर केवर डिस्क एनवायरनमेंट में प्रकाशित हुआ था। अध्ययन में आठ अलग-अलग प्रकार के पॉलिमेर सैमवियों की उपस्थिति की पुष्टि की गई है, जिनमें सबसे आम थे, जो 58.928% थे। कुल मिलाकर लगभग 35.714% लाल रंग का था।
विश्लेषण से पता चलता है कि टोकन में पाए गए अवशेष अनुपचारित जल संसाधनों से उत्पन्न हो सकते हैं, जबकि अन्य जल शोधन में उपयोग किए जा सकने वाले लाभ या भूजल के उपयोग के लिए बोतल वाली से मिश्रित हो सकते हैं।
कंसल्टेंसी में कहा गया कि नुकसान यह नहीं है कि केरल में बोतलबंद पानी पर हुआ ताजा अध्ययन हो या चीन, अमेरिका और जर्मनी के सुपरमार्केट की रिपोर्ट, सभी ये सुझाव देते हैं कि माइक्रोसाल्टिक मनुष्य का जीवन और पर्यावरण, दोनों के लिए बड़ा खतरा बन गया है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि, यदि समय इस ओर ध्यान नहीं दिया गया और यदि चयन नहीं किया गया, तो प्लास्टिक मानव जाति पूरी तरह से पूरी पृथ्वी के लिए एक बहुत बड़ा और गंभीर खतरा नहीं बन जाएगी। आज प्लास्टिक का जिम्मेदार उपयोग नहीं किया जा रहा है और न ही इसकी रिसाइक्लिंग पर किसी का ध्यान है।
आज हमारे घर,अफिसेज से लेकर हर जगह प्लास्टिक का बोलबाला है। ऐसी कोई भी जगह नहीं है, जहां प्लास्टिक का किसी भी रूप में कोई आविर्भाव नहीं हो। प्लास्टिक हमारी जिंदगी का बहुत ही अहम, महत्वपूर्ण और जरूरी हिस्सा बन चुका है। हमारे शेविंग रेजर से लेकर हमारे टुथब्रश, इंस्टीट्यूट की बाल्टी, मैग, हमारे प्लाज़, हमारे पेन(कलम), हमारे भोजन की थाली, प्लेट, कटोरी तक सब प्लास्टिक का ही है।
संक्षेप में कहा जाय तो, हम माइक्रोप्लास्टिक्स का सामना हर जगह करते हैं। मसलन, कूड़ा-करकट, कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन, सफाई उत्पाद, बारिश, समुद्री भोजन, उपजी, नमक, आदि में।
आज मिट्टी, पानी, भोजन,वायु और मानव शरीर सहित सभी जीवित जीवों में माइक्रोसाल्टिक कण पाए गए हैं।
माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक के प्लास्टिक से बने पदार्थ हैं और ये हवा, पानी, और ज़मीन में भी पाए जाते हैं।
असल में ये हमारे शरीर में शांति पाने और खाने के टोकन की ताकत हैं। इतना ही नहीं, ये हमारे रक्त, दांत, और प्लेसेंटा में भी पाए गए हैं। सच तो यह है कि हमारे शरीर के लगभग हर हिस्से में पाए जाते हैं, क्योंकि आज हम बेतहांशा रूप से हर चीज में प्लास्टिक का इस्तेमाल कर रहे हैं। आज हम चाय, कॉफ़ी तक प्लास्टिक के टुकड़े कप में डालते हैं।
यूनीपी के अनुसार, हर साल 23 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा दुनिया की जल क्षमता में लीक हो जाता है। हाल ही में जो शोध सामने आया वह यह है कि, बोतलबंद पानी के उत्पादन में बेहतर गुणवत्ता वाले नियंत्रण कक्ष की आवश्यकता पर प्रकाश व्यवस्था की व्यवस्था की गई है। इसमें कोई दोष नहीं है कि, प्लास्टिक का उपयोग कम किया जाए और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उपयोग के बाद इसे वैज्ञानिक रूप से लागू किया जाए।
यहां यह उल्लेखनीय है कि, कुछ समय पहले साइंस एडवांस में प्रकाशित एक अध्ययन में यह भी बताया गया था कि, प्लास्टिक के कुछ कण इंसान के दिमाग में प्रवेश कर रहे हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि माइक्रोसाल्टिक के मानव स्वास्थ्य पर बहुत गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। मसलन, सूजन, जीनोटॉक्सिसिटी, आयोडीनेटाइड तनाव, एपोप्टोसिस और नेक्रोसिस जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इतना ही नहीं, कैंसर, हृदय रोग, सूजन आंत्र रोग, मधुमेह, रुमेटी गठिया, और ऑटो-इम्यून स्थिर स्थिति से जुड़े हो सकते हैं।
फैक्ट्रियों को बताया गया है कि, माइक्रोसाल्टिक कण रॉकेट के प्रकाश पैमाने की प्रक्रिया को भी बाधित किया जा रहा है, जिसमें 14 फीसदी तक की गिरावट हो सकती है। प्रकाश आर्किटेक्चर, आईएसओ के भोजन बनाने की प्रक्रिया है, जिसमें वे श्वसन के विपरीत, कार्बन डाइऑक्साइड पिरामिड ग्रहण करते हैं, और पर्यावरण में ऑक्सीजन शामिल हैं।
हमारे ग्रह पर कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए यह प्रक्रिया देखना भी आवश्यक है।
प्लास्टिक एक ऐसी चीज़ है जो करोड़ों वर्षों तक भी नष्ट नहीं होती। कुछ लोगों का यह मानना है कि, प्लास्टिक को जलाने से यह खत्म हो जाता है, लेकिन यह नुकसानदायक होता है। प्लास्टिक को जलाना तो और भी खतरनाक है। वैज्ञानिक कहते हैं कि प्लास्टिक को जलाने से डाइऑक्सिन, फ़्यूरान और पीसीबी जैसी रासायनिक गैसें निकलती हैं। हाउस गैसों की लहर से धरती की हरियाली में गिरावट होती है और हमारी धरती की प्रशंसा होती है।
अध्ययन में पाया गया है कि, माइक्रोसाल्टिक समुद्री डाकूओं के कार्बन डाइऑक्साइड को अलग करने और ऑक्सीजन के उत्पादन को वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण टुकड़ों में बाँटने का काम किया जाता है। ये कमी हमारे और हमारे नीले ग्रह(धरती) के स्वास्थ्य को और खतरों में डालती है। आज हमारी धरती पर सतत प्लास्टिक की जड़ में आती चली जा रही है। प्लास्टिक के दस्तावेज़ से हर किसी को आश्चर्यजनक आश्चर्य हो सकता है।
मसलन,दुनिया भर में हर साल करीब 903 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है। दुनिया भर में हर साल करीब 450 मिलियन टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जबकि साल 2022 तक यह आंकड़ा 400 करोड़ टन तक पहुंच गया है, जिससे स्थिति में सुधार हो सकता है।
क्या यह आश्चर्यजनक और गंभीर बात नहीं है कि, हर साल लगभग 1.3 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंक दिया जाता है। एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार पाया गया है कि, प्लास्टिक 11 किमी गहराई तक पहुँच गयी है !
इतना ही नहीं, दुनिया भर में पैदा हुए सात अरब टन प्लास्टिक में से 10 फीसदी से भी कम को रिसाइकल किया गया है।
आंकड़े बताते हैं कि, हर साल प्लास्टिक प्रदूषण से 10 लाख से अधिक समुद्री पक्षी और 100,000 समुद्री जानवर मर जाते हैं।
जानकारी है कि, 100% बच्चों के पेट में प्लास्टिक होता है। उल्लेखनीय है कि, हमारे महासागर में अब 5.25 ट्रिलियन प्लास्टिक के वृहद और सूक्ष्म टुकड़े हैं, और महासागर के प्रत्येक वर्ग मील में 46,000 टुकड़े हैं, वजन का वजन 269,000 टन तक है।
क्या यह गंभीर बात नहीं है कि, वर्तमान में हमारे महासागरों में 75 से 199 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, और अन्य 33 मिलियन प्लास्टिक के टुकड़े हमारे महासागरों में प्रवेश करते हैं और हर दिन लगभग 8 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जो वर्ष 2034 तक दोगुना हो जाता है।
आंकड़े बताते हैं कि, समुद्र की सतह का 88% हिस्सा प्लास्टिक तंबाकू से बना है और हर साल 8 से 14 मिलियन टन तक कचरा हमारे महासागर में प्रवेश करता है। प्रत्येक वर्ष में ब्रिटेन लगभग 1.7 मिलियन टन प्लास्टिक और अमेरिका लगब्भग 38 मिलियन टन हर प्लास्टिक का योगदान देता है।
असल में, प्लास्टिक लिपस्टिक सबसे बड़ा प्लास्टर है, जिसके कारण अकेले अमेरिका में 80 मिलियन टन कचरा पैदा होता है। आज हर चीज की संरचना प्लास्टिक में होती है। हमें इससे बचना होगा और इसके बेहतर विकल्प तलाशने होंगे।
आज हर मिनट 10 लाख से अधिक प्लास्टिक इलेक्ट्रान कूड़े में फेंकी जाती हैं। इतना ही नहीं, विश्व में प्रति वर्ष 500 टन प्लास्टिक से अधिक प्लास्टिक बैग का उपयोग किया जाता है-यानी पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति के लिए 150 बैग। प्लास्टिक के आंकड़े वास्तव में बहुत गंभीर हैं।
इतना ही नहीं, मानव उपभोक्ता के लिए 3 में से 1 मछली में प्लास्टिक होता है। वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (यूएनईए) में प्लास्टिक संधि पर प्रस्ताव शामिल होने के बावजूद अब तक प्लास्टिक पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है।
असल में यह सिद्धांत है कि, हम सभी प्लास्टिक को लेकर बहुत ही कठिनाई से जूझ रहे हैं। आज भी हमारे देश में सिंगल यूनिवर्सल प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है। यह प्रदूषण, पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और पिछड़ा वर्ग को नुकसान पहुंचा रहा है। ग्लोबल प्रदूषण को जन्म दे रहा है। भारत में 1 जुलाई, 2022 से सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस प्रतिबंध के तहत, एक बार उपयोग किए जाने वाले प्लास्टिक के निर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग पर रोक है, लेकिन इसके बावजूद जिस तरह से एकल यूज़ प्लास्टिक का उपयोग खराब जारी है, वह खतरे में पड़ने वाला है।
आज इस बात की जरूरत है कि, हम प्लास्टिक के उपयोग को लेकर सावधानी बरतें, लोगों को सलाह दें और हमारी प्रकृति, पर्यावरण को प्लास्टिक के खतरों से बचाएं।
प्लास्टिक प्रदूषण आज एक वैश्विक समस्या है, हम सभी को इस समस्या के समाधान के लिए सामूहिकता से आगे आना होगा। वास्तव में हम अपने ब्लू ग्रह को प्लास्टिक असुर से बचाएंगे!
*****