मुकेश अंबानी और ट्रंप का क्या कनेक्शन, रिलायंस को इतनी तवज्जो क्यों दे रहा अमेरिका?
Mukesh Ambani और Trump का क्या कनेक्शन? Reliance को इतनी तवज्जो को क्यों दे रहा अमेरिका? Vaichariki
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो दिल्ली की सत्ता के गलियारों से निकलकर मुकेश अंबानी की रिफ़ाइनरी क्यों जा रहे हैं? आख़िर जामनगर में ऐसा क्या है जो भारत, अमेरिका, रूस और ईरान के रिश्तों में अहम भूमिका निभा रहा है? समझिए सी राजा मोहन के इस आर्टिकल से
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो दिल्ली की सत्ता के गलियारों से निकलकर मुकेश अंबानी की रिफ़ाइनरी क्यों जा रहे हैं? आख़िर जामनगर में ऐसा क्या है जो भारत, अमेरिका, रूस और ईरान के रिश्तों में अहम भूमिका निभा रहा है? ये समझा रहे हैं अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट और इंडियन एक्सप्रेस में अंतरराष्ट्रीय मामलों के कंट्रिब्यूटिंग एडिटर सी राजा मोहन
नई-दिल्ली (इंडियन एक्सप्रेस हिंदी): अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो का 21 अक्टूबर को जामनगर में रिलायंस की रिफ़ाइनरी जाने का प्लान है। इस दौरे की अहमियत भारत और अमेरिका के रिश्तों पर चलने वाली जानी पहचानी बहस से कहीं आगे जाएगी। जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचीदा सियासत की एक खिड़की है। इसी सियासत ने हाल में अमेरिका, रूस और ईरान के साथ भारत के रिश्तों को आकार दिया है।
मुंबई में टाटा और अडानी से रूबियो की मुलाकात और जामनगर में मुकेश अंबानी से उनकी बातचीत, भारतीय पूंजी और देश की विदेश नीति के बढ़ते रिश्ते को भी दिखाती है। भारतीय कंपनियों का आर्थिक वज़न बढ़ रहा है। उनकी पहुंच दुनिया भर में फैल रही है। ऐसे में वो भारत की कूटनीति के तरकश का एक अहम तीर बनती जा रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे दूसरे बड़े देशों में होता है।
अमेरिकी कारोबार और विदेश नीति के रिश्ते को एक पुरानी कहावत बख़ूबी बयान करती है। 'जो जनरल मोटर्स के लिए अच्छा है वो अमेरिका के लिए भी अच्छा है।' जनरल मोटर्स अमेरिका की एक बड़ी कार कंपनी है। आज जनरल मोटर्स का वो रुतबा नहीं रहा जो कभी हुआ करता था। पर ये उसूल आज भी उतना ही मायने रखता है। आज अमेरिका की वित्तीय और टेक कंपनियां उसकी विदेश नीति पर छाई हुई हैं।
20वीं सदी की शुरुआत में हाउस ऑफ़ मॉर्गन दुनिया की जियोपोलिटिक्स में दख़ल रखता था। हाउस ऑफ़ मॉर्गन यानी अमेरिका का एक ताक़तवर बैंकिंग घराना। वो असर आज एक अलग रूप में ज़िंदा है। अमेरिका के सबसे बड़े बैंक जे पी मॉर्गन चेज़ के CEO जेमी डाइमन का बीजिंग और दूसरी राजधानियों में किसी शाही मेहमान जैसा स्वागत होता है। इधर सिलिकॉन वैली के नए टेक दिग्गज भी 21वीं सदी की विश्व राजनीति पर बड़ा असर डालने लगे हैं। सिलिकॉन वैली यानी अमेरिका का वो इलाक़ा जहां दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां हैं।
इस तरीक़े की शुरुआत यूरोप ने की थी, 17वीं सदी में अपनी ईस्ट इंडिया कंपनियों के ज़रिए। ईस्ट इंडिया कंपनियां यानी व्यापार के बहाने एशिया में आकर राज जमाने वाली यूरोपीय कंपनियां। आज भी यूरोप की सरकारें बाज़ार और कॉन्ट्रैक्ट्स जीतने के लिए अपनी कंपनियों के साथ मिलकर काम करती हैं। चीन ने 1990 के दशक के आख़िर से 'गो आउट' नीति अपनाई। यानी चीनी कंपनियों को विदेश में फैलने के लिए बढ़ावा देने की नीति। इससे बीजिंग की आर्थिक पहुंच और सियासी असर दोनों बढ़े।
दुनिया के नेताओं के साथ मुकेश अंबानी
दुनिया के नेताओं के साथ मुकेश अंबानी को देखना भारतीय लोगों को अजीब लग सकता है। पर ये एक लंबे बदलाव का नतीजा है। कुछ साल पहले भारत आने वाले विदेशी नेता अक्सर बेंगलुरु में इन्फ़ोसिस का कैंपस देखने जाते थे। वो वक़्त था जब देश की IT कंपनियां दुनिया की बड़ी खिलाड़ी बनकर उभर रही थीं।
पिछले अक्टूबर में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर भारत आए और वो दिल्ली नहीं बल्कि मुंबई गए! वहीं उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की। उन्होंने भारतीय कारोबारी नेताओं से बात की। और बॉलीवुड के प्रोड्यूसर्स के साथ ब्रिटिश स्टूडियोज़ में फ़िल्में बनाने की साझेदारी के सौदे किए। जहां भारतीय पूंजी के पास बड़ा पैमाना हो या कोई ख़ास बढ़त हो वहां वो कूटनीति के समीकरण का हिस्सा बनती जा रही है।
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(समाचार & फोटो साभार - इंडियन एक्सप्रेस हिंदी)
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