Climate कहानी: अब रात में भी उगेगा सूरज? अंतरिक्ष से रोशनी बेचने का दावा
लखनऊ: आज 'विशेष' में प्रस्तुत है, "Climate कहानी", जिसका शीर्षक है- "अब रात में भी उगेगा सूरज? अंतरिक्ष से रोशनी बेचने का दावा।
अब रात में भी उगेगा सूरज? अंतरिक्ष से रोशनी बेचने का दावा
कल्पना कीजिए।
रात के 9 बजे हैं। शहर में अंधेरा है। लेकिन किसी सोलर फार्म पर अचानक दिन जैसा उजाला हो जाता है।
न कोई सूरज उगा है।
न कोई बिजली का बल्ब जला है।
यह रोशनी सीधे अंतरिक्ष से आ रही है।
सुनने में साइंस फिक्शन लगता है, लेकिन अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में एक स्टार्टअप इसे हकीकत बनाने की कोशिश कर रहा है। इस कंपनी का नाम है Reflect Orbital।
कंपनी का दावा है कि वह अंतरिक्ष में विशाल दर्पण वाले सैटेलाइट भेजेगी, जो सूरज की रोशनी को पृथ्वी पर वापस प्रतिबिंबित करेंगे। मतलब, रात में भी सूरज की रोशनी “ऑर्डर” की जा सकेगी।
और हां। कंपनी कहती है कि आप इसे मोबाइल ऐप से बुक भी कर सकेंगे।
अंतरिक्ष से रोशनी कैसे आएगी?
इस तकनीक का आइडिया हैरान करने वाला है, लेकिन सिद्धांत बहुत सीधा है।
कंपनी ऐसे सैटेलाइट बना रही है जिनमें विशाल रिफ्लेक्टिव मिरर लगे होंगे। ये दर्पण अंतरिक्ष में सूर्य की रोशनी पकड़ेंगे और उसे पृथ्वी पर किसी खास जगह की ओर मोड़ देंगे।
रोशनी का दायरा लगभग 5 किलोमीटर तक हो सकता है।
और इसकी चमक को कंट्रोल भी किया जा सकता है।
कभी फुल मून जैसी हल्की रोशनी तो कभी दोपहर जैसी तेज रोशनी।
सैटेलाइट को घुमाकर रोशनी को चालू और बंद किया जा सकेगा। यानी, जैसे आप बिजली का स्विच ऑन करते हैं, वैसे ही “सूरज” को ऑन किया जा सकता है।
असली लक्ष्य. रात में भी सोलर बिजली
इस तकनीक का सबसे बड़ा इस्तेमाल सोलर ऊर्जा में देखा जा रहा है।
दुनिया भर में सोलर ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या वही पुरानी है।
सूरज ढलते ही बिजली खत्म।
अगर रात में भी सोलर पैनल पर रोशनी पड़े, तो बिजली उत्पादन कई घंटों तक बढ़ सकता है।
कंपनी का दावा है कि भविष्य में इससे सोलर प्लांट की क्षमता करीब 20% तक बढ़ाई जा सकती है।
मतलब, शाम और रात के शुरुआती घंटों में भी सोलर बिजली मिल सकती है, जब बिजली की मांग अक्सर सबसे ज्यादा होती है।
एक हजार सैटेलाइट का प्लान
यह अभी शुरुआती चरण में है।
कंपनी ने अभी तक कुछ प्रोटोटाइप दर्पण बनाए हैं, जिनका आकार लगभग 18 मीटर तक है। इन्हें ऊंचे गुब्बारों के जरिए टेस्ट भी किया गया है।
लेकिन असली योजना बहुत बड़ी है।
2028 तक 1000 सैटेलाइट
2030 तक लगभग 5000 सैटेलाइट
भविष्य में कंपनी ऐसे दर्पण बनाने की बात कर रही है जिनका आकार 180 फुट तक हो सकता है।
अगर यह नेटवर्क बन गया, तो अंतरिक्ष में एक तरह की “रोशनी की फ्लीट” तैयार हो जाएगी।
लेकिन क्या यह सच में काम करेगा?
यहीं से कहानी थोड़ी जटिल हो जाती है।
कई वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरिक्ष से भेजी गई रोशनी की ताकत अभी बहुत सीमित है।
कुछ शुरुआती गणनाओं के अनुसार, एक सैटेलाइट से मिलने वाली रोशनी दोपहर के सूरज से लाखों गुना कम हो सकती है।
यानी, बड़े पैमाने पर असर डालने के लिए हजारों सैटेलाइट की जरूरत पड़ेगी।
और फिर आता है सबसे बड़ा सवाल।
खर्च।
एक सैटेलाइट की लागत अभी करीब 2 मिलियन डॉलर तक हो सकती है।
हालांकि कंपनी कहती है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर यह लागत 1 लाख डॉलर से भी कम हो सकती है।
इसके अलावा हर सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने का खर्च अलग।
बैटरी से मुकाबला
ऊर्जा विशेषज्ञ कहते हैं कि यह तकनीक दिलचस्प जरूर है, लेकिन फिलहाल इसका मुकाबला बैटरी स्टोरेज से है।
आज दुनिया भर में सोलर बिजली को स्टोर करने के लिए बड़े-बड़े ग्रिड बैटरी सिस्टम लगाए जा रहे हैं।
इनकी खासियत यह है कि बिजली दिन में स्टोर होती है रात में तुरंत इस्तेमाल की जा सकती है जबकि अंतरिक्ष वाली रोशनी सैटेलाइट के गुजरने पर ही मिल सकती है और कुछ मिनटों के लिए ही।
इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तकनीक शायद बैटरी की जगह नहीं लेगी, बल्कि कुछ खास परिस्थितियों में पूरक तकनीक बन सकती है।
एक और चिंता. रात का अंधेरा
इस तकनीक को लेकर एक और बड़ी बहस शुरू हो चुकी है।
अगर हजारों सैटेलाइट रात में पृथ्वी पर रोशनी भेजने लगे, तो इसका असर रात के प्राकृतिक अंधेरे पर पड़ सकता है।
वैज्ञानिकों को डर है कि इससे समुद्री कछुओं का व्यवहार बदल सकता है कीड़े-मकोड़ों और पक्षियों पर असर पड़ सकता है और खगोल विज्ञान यानी तारों का अध्ययन भी मुश्किल हो सकता है।
यानी, यह सिर्फ ऊर्जा का सवाल नहीं है।
यह पृथ्वी के प्राकृतिक रिद्म का सवाल भी है।
एक पागल आइडिया. या भविष्य की ऊर्जा?
इतिहास बताता है कि कई बड़ी तकनीकें कभी “असंभव” लगती थीं।
कभी सोलर ऊर्जा भी महंगी थी इलेक्ट्रिक कार भी मजाक लगती थी और निजी रॉकेट भी सपना थे।
आज ये सब हकीकत हैं।
अब सवाल यह है कि क्या अंतरिक्ष से रोशनी भेजने का यह विचार भी भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था का हिस्सा बनेगा।
या फिर यह सिर्फ सिलिकॉन वैली का एक चमकदार प्रयोग बनकर रह जाएगा।
फिलहाल इतना जरूर तय है।
अगर यह सफल हुआ, तो आने वाले वर्षों में दुनिया को शायद सूरज का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
सूरज… बस एक ऐप की दूरी पर होगा।
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